IPS की नौकरी से बक्सर की सियासत तक : आनंद मिश्रा की कार्यशैली ने खींचा सबका ध्यान

पटना/बिहार (रिपोर्ट : अनूप नारायण सिंह) : 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भारतीय पुलिस सेवा की नौकरी छोड़कर बक्सर से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरे आनंद मिश्रा से उस समय तक मेरी कोई खास पहचान नहीं थी। भाजपा के टिकट के वे प्रबल दावेदार माने जा रहे थे, लेकिन पार्टी ने बक्सर से मिथिलेश कुमार तिवारी को उम्मीदवार बनाया। इसके बाद आनंद मिश्रा ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया।

इसी दौरान उनका एक भाषण सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ। भोजपुरी में दिए इस भाषण में उन्होंने कहा था कि चुनाव जीतूं या हारूं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन बक्सर में अस्पताल बनना चाहिए, यह उनका वादा है। जिस आत्मविश्वास के साथ आनंद मिश्रा यह बात कह रहे थे, उसने मुझे प्रभावित किया। लगा कि इस व्यक्ति की बातों में केवल राजनीतिक भाषण नहीं, बल्कि जमीन से जुड़ी सच्चाई भी है।

मैंने इसी भावना के साथ एक पोस्ट लिखा, जिसे करीब 70-80 हजार लोगों ने साझा किया। यह बात आनंद मिश्रा तक भी पहुंची। हालांकि लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उनका हौसला कायम रहा।

पटना में एक कार्यक्रम के दौरान अचानक मुलाकात हुई तो उन्होंने मुझे पहचान लिया। बातचीत हुई और नंबरों का आदान-प्रदान हुआ। कैमरे पर करीब 10 मिनट की बातचीत के बाद यह महसूस हुआ कि भारतीय पुलिस सेवा तक पहुंचने वाले व्यक्तित्व सामान्य नहीं होते। उनके व्यक्तित्व और सोच में कुछ ऐसा जरूर होता है, जो उन्हें आम लोगों से अलग बनाता है।

उस समय आनंद मिश्रा प्रशांत किशोर की टीम के साथ थे। बाद में उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें बक्सर से उम्मीदवार बनाया और इस बार उन्होंने जीत दर्ज कर विधायक बनने में सफलता हासिल की।

विधायक बनने के बाद आनंद मिश्रा की काम करने की शैली बिहार की राजनीति में चर्चा का विषय बन गई है। कभी वे सरकारी अस्पताल पहुंचकर व्यवस्था का जायजा लेते दिखाई देते हैं तो कभी सरकारी कार्यालय में आम लोगों के साथ पहुंचकर अधिकारियों को उनकी जिम्मेदारियां याद दिलाते नजर आते हैं। उनकी यह सक्रियता और सीधे मौके पर पहुंचकर समस्याओं को देखने का तरीका लोगों का ध्यान खींच रहा है।

आनंद मिश्रा की राजनीतिक यात्रा को देखें तो यह सफर नौकरी छोड़कर चुनाव लड़ने, हार के बावजूद मैदान में डटे रहने और अंततः विधानसभा पहुंचने तक का है। अब देखना दिलचस्प होगा कि विधायक के रूप में उनकी यह कार्यशैली आगे किस दिशा में जाती है।
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