700 साल पुराना चमत्कारी देवरी काली मंदिर! बांस पर धागा बांधते ही पूरी होती है मन्नत, अद्भुत आस्था का केंद्र बना झारखंड

रांची/झारखंड, 5 मई। झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित देवड़ी गांव में बना प्राचीन देवरी काली मंदिर आज भी आस्था, रहस्य और इतिहास का अद्भुत संगम बना हुआ है। करीब 700 वर्ष पुराने इस मंदिर में देवी काली के प्रति अटूट श्रद्धा के साथ-साथ ऐसी अनोखी परंपराएं निभाई जाती हैं, जो इसे देशभर के भक्तों के बीच विशेष पहचान दिलाती हैं।

मनोकामना पूरी करने की अनोखी परंपरा

देवरी काली मंदिर की सबसे खास पहचान यहां निभाई जाने वाली बांस पर धागा बांधने की परंपरा है। भक्त अपनी इच्छाओं और मनोकामनाओं को लेकर मंदिर पहुंचते हैं और बांस के बने ढांचे पर लाल और पीले रंग के पवित्र धागे बांधते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन और श्रद्धा से बांधी गई मन्नत जरूर पूरी होती है। जब भक्तों की इच्छा पूरी हो जाती है, तो वे दोबारा मंदिर आकर विधिपूर्वक धागा खोलते हैं और माता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। यह अनोखी परंपरा यहां आने वाले श्रद्धालुओं के विश्वास को और भी गहरा बनाती है।

इतिहास और रहस्य से जुड़ा मंदिर

स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, तामार क्षेत्र के एक राजा को देवी काली ने स्वप्न में दर्शन दिए थे। इसके बाद उन्होंने घने जंगलों के बीच इस पवित्र स्थल की खोज कर मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर को लेकर एक और रहस्यमयी मान्यता प्रचलित है, कहा जाता है कि जो भी व्यक्ति मंदिर के मूल ढांचे में बदलाव या छेड़छाड़ करने की कोशिश करता है, उसे नुकसान उठाना पड़ता है। यही कारण है कि सदियों बीत जाने के बावजूद मंदिर का मूल स्वरूप आज भी पूरी तरह सुरक्षित और अक्षुण्ण बना हुआ है।

बिना सीमेंट के बनी अद्भुत वास्तुकला

देवरी काली मंदिर अपनी अनोखी वास्तुकला के लिए भी प्रसिद्ध है। इस मंदिर का निर्माण बिना सीमेंट या किसी जोड़ने वाले पदार्थ के केवल पत्थरों को आपस में फंसाकर किया गया है। बलुआ पत्थरों से निर्मित इसकी दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी पौराणिक कथाओं और देवी-देवताओं की गाथाओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत करती है। हर एक शिल्पकला इतनी सूक्ष्म और आकर्षक है कि देखने वाला इसकी कारीगरी पर आश्चर्यचकित रह जाता है।

16 भुजाओं वाली दिव्य प्रतिमा

मंदिर का मुख्य आकर्षण देवी काली की करीब 3 फीट ऊंची प्राचीन प्रतिमा है, जो अपने आप में अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है। इस प्रतिमा में देवी का सोलह भुजाओं वाला स्वरूप देखने को मिलता है, जो सामान्यतः अन्य स्थानों पर कम ही देखने को मिलता है। इसी विशेषता के कारण इस मंदिर को स्थानीय लोग “सोलहभुजी मंदिर” के नाम से भी जानते हैं। देवी की प्रतिमा सुनहरे आभूषणों से सुसज्जित है और उनके हाथों में विभिन्न आयुध जैसे धनुष, ढाल और पुष्प सुशोभित हैं।

धार्मिक ही नहीं, पर्यटन का भी प्रमुख केंद्र

देवरी काली मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। रांची आने वाले पर्यटक यहां जरूर पहुंचते हैं। इसके साथ ही आसपास स्थित रांची स्टेट म्यूजियम और योगदा सत्संग सोसाइटी आश्रम जैसे दर्शनीय स्थल यात्रा को और भी यादगार बना देते हैं। कुल मिलाकर, देवरी काली मंदिर आस्था, इतिहास और रहस्य का ऐसा संगम है, जहां श्रद्धालु केवल दर्शन ही नहीं, बल्कि एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव लेकर लौटते हैं।
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