लखनऊ/उत्तर प्रदेश, 17 अगस्त। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी की 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर रणनीति पर अभी से चर्चा तेज हो गई है। वर्ष 2007 में दलित-ब्राह्मण सामाजिक समीकरण के सहारे पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा के सामने अब उसी तरह के व्यापक सामाजिक गठजोड़ को दोबारा खड़ा करने की चुनौती है। खासकर पार्टी से कई प्रमुख ब्राह्मण नेताओं के अलग होने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि मायावती पुराने चेहरों के बिना ब्राह्मण समाज को पार्टी से जोड़ने के लिए क्या नई रणनीति अपनाएंगी।
2007 का फार्मूला बना था मिसाल
वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने दलित मतदाताओं के अपने मजबूत आधार के साथ ब्राह्मण समाज को जोड़ा था। इस सोशल इंजीनियरिंग ने पार्टी को व्यापक सामाजिक समर्थन दिलाया और मायावती पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल हुई थीं। उस समय सतीश चंद्र मिश्रा समेत कई ब्राह्मण नेताओं की भूमिका पार्टी की रणनीति में महत्वपूर्ण रही।
पुराने चेहरों की कमी बड़ी चुनौती
पिछले वर्षों में बसपा के कई चर्चित ब्राह्मण चेहरे पार्टी से अलग हो चुके हैं या निष्कासित किए गए हैं। राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्र सिंह रावत के अनुसार, अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा के हालिया निष्कासन के साथ ही राकेशधर त्रिपाठी, रंगनाथ मिश्रा, रामू द्विवेदी, कुशल तिवारी, विनय शंकर तिवारी, ब्रजेश पाठक और गुड्डू त्रिपाठी जैसे नाम भी अब बसपा के साथ नहीं हैं। रामवीर उपाध्याय का परिवार भी कभी बसपा की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। इनमें से कई नेता बाद में दूसरे दलों में सक्रिय हुए और कुछ मंत्री भी बने।
सतीश मिश्रा अब भी प्रमुख चेहरा
रावत के मुताबिक, वर्तमान में सतीश चंद्र मिश्रा बसपा के प्रमुख ब्राह्मण चेहरे के तौर पर पार्टी के साथ जुड़े हुए हैं। ऐसे में मायावती के सामने चुनौती केवल नए ब्राह्मण नेताओं को आगे बढ़ाने की नहीं है, बल्कि विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच संतुलन बनाते हुए संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने की भी है।
ब्राह्मण संगठन से जुड़े अभिषेक पांडेय का कहना है कि उत्तर प्रदेश के कई विधानसभा क्षेत्रों में ब्राह्मण मतदाता चुनावी समीकरण को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। इसलिए 2027 से पहले ब्राह्मण समाज के बीच राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाना विभिन्न दलों की रणनीति का अहम हिस्सा हो सकता है।
मायावती का नए नेतृत्व पर जोर
पार्टी से अलग हुए नेताओं को लेकर मायावती का रुख अलग रहा है। उनका कहना है कि पार्टी छोड़ने या निष्कासित किए गए नेताओं की राजनीतिक भूमिका का आकलन उनके कार्यों से किया जाना चाहिए। मायावती ने यह भी कहा है कि बसपा में लंबे समय से निष्ठावान वरिष्ठ नेता नए, कर्मठ और समर्पित कार्यकर्ताओं, खासकर युवाओं को तैयार कर रहे हैं। पार्टी का यह संगठनात्मक प्रशिक्षण आगे भी जारी रहेगा।
अंटू मिश्रा ने उठाए आत्ममंथन के सवाल
बसपा से निष्कासित अनंत मिश्रा ने कहा कि 2007 में ब्राह्मण समाज को बसपा से जोड़ने में सतीश मिश्रा का चेहरा, मायावती के प्रति भरोसा और जमीनी कार्यकर्ताओं की मेहनत महत्वपूर्ण रही थी। उनके मुताबिक, उस दौर में ब्राह्मण समाज को सम्मान और राजनीतिक भागीदारी का स्पष्ट संदेश मिला था। उन्होंने पार्टी के लगातार कमजोर होते चुनावी प्रदर्शन पर नेतृत्व से आत्ममंथन की जरूरत बताई है।
अब अंटू मिश्रा का कहना है कि वह समर्थकों और कार्यकर्ताओं के बीच जाकर उनकी राय जानेंगे और प्राप्त सुझावों के आधार पर आगे की राजनीतिक रणनीति तय करेंगे।
2027 की राह में बसपा के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह पुराने सामाजिक समीकरण को नए चेहरों, नई रणनीति और मजबूत जमीनी संगठन के साथ दोबारा खड़ा कर पाएगी।
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