जो उसने देखा, उसे चाहा… और जिसे चाहा, उसे जीत लिया : महाराष्ट्र की राजनीति में फड़नवीस का उदय

नई दिल्ली। देवेंद्र फड़नवीस का महाराष्ट्र की राजनीति में प्रवेश किसी रहस्यमयी या तिलिस्मी कथा जैसा नहीं रहा। उनकी राजनीतिक यात्रा भारतीय जनता पार्टी के सांगठनिक ढांचे के भीतर एक सामान्य, अनुशासित और क्रमिक उभार की कहानी है। वे न किसी विरासत के सहारे आए, न ही किसी तात्कालिक राजनीतिक संयोग से। लेकिन किस्मत ने उनका साथ ठीक उसी दौर में दिया, जब भाजपा का “हिंदुत्व 2.0” आकार ले चुका था और पार्टी एक नए, आक्रामक और आत्मविश्वास से भरे दौर में प्रवेश कर रही थी।

यह वह समय था जब भाजपा खुद को कमजोर गठबंधनों और सहयोगियों की मजबूरी से बाहर निकाल रही थी। पार्टी का नया केंद्रीय नेतृत्व गठबंधन के दबाव में निर्णय लेने को तैयार नहीं था और उसके पीछे अपार जनसमर्थन खड़ा था। दशकों बाद देश ने एक ऐसी राजनीतिक ताकत को उभरते देखा, जो न सिर्फ सत्ता में थी, बल्कि वैचारिक और रणनीतिक रूप से भी बेहद सशक्त नजर आ रही थी। इसी माहौल ने फड़नवीस को मुंबई की सियासत के केंद्र में ला खड़ा किया।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज हो चुकी थीं। टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर माइंड गेम खेलने लगे थे—क्या नई भाजपा, उद्धव ठाकरे को वही सम्मान देगी, जो कभी बालासाहेब ठाकरे को दिया जाता था? इसी सवाल ने शिवसेना के भीतर बेचैनी पैदा कर दी। उद्धव ठाकरे और उनका परिवार असहज होने लगा। बालासाहेब ठाकरे जिन नेताओं को राजनीतिक रूप से तुच्छ मानते थे, उद्धव उन्हें उसी नजर से देखने लगे। यही मानसिकता धीरे-धीरे निर्णयों पर हावी होती चली गई।

इसी क्रम में उद्धव ठाकरे ने भाजपा को संदेश भिजवाया कि सीटों के बंटवारे पर बातचीत करने यदि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को आना है, तो वे ‘मातोश्री’ आएं। वे प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र फड़नवीस जैसे “छोटे नेता” से मिलने को तैयार नहीं थे। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी रही कि अमित शाह मातोश्री पहुंचे, उन्हें इंतजार कराया गया और मुलाकात तो हुई, लेकिन फड़नवीस समेत महाराष्ट्र भाजपा के अन्य नेताओं को उद्धव के केबिन में प्रवेश तक नहीं मिला।

यहीं से 25 वर्षों पुराना भाजपा–शिवसेना गठबंधन टूट गया। इसी बीच भाजपा की रणनीति के चलते कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठबंधन भी बिखर गया। परिणाम यह हुआ कि महाराष्ट्र में सभी प्रमुख दल स्वतंत्र रूप से चुनावी मैदान में उतर गए। जब नतीजे आए, तो भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इस पूरे घटनाक्रम में फड़नवीस की अहमियत इसी बात से समझी जा सकती है कि राज्य में कई वरिष्ठ और कद्दावर नेताओं की मौजूदगी के बावजूद भाजपा ने बिना किसी विवाद के उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए चुना।

इसके बाद की कहानी देश ने टेलीविजन स्क्रीन पर लाइव देखी। कैसे राजनीतिक मजबूरियों में उद्धव ठाकरे दोबारा साथ आए, फिर अगला चुनाव साथ लड़ा गया, और आखिरकार परिणाम के दिन सत्ता की राजनीति में पीठ में छुरा घोंप दिया गया। उद्धव इसे अपनी कूटनीतिक जीत मान रहे थे। उन्हें लगता था कि यह चाल उन्हें राजनीतिक बढ़त दिलाएगी।

लेकिन वे शायद दीवार पर लिखी इबारत नहीं पढ़ पाए। उनके सामने ऐसे लोग खड़े थे, जिनके पास अथाह संसाधन थे और उससे भी ज्यादा मजबूत रणनीतिक दिमाग। देवेंद्र फड़नवीस ने अपमान का घूंट जरूर पिया, लेकिन उन्होंने समय आने पर अपने राजनीतिक कौशल से न सिर्फ उद्धव ठाकरे बल्कि शरद पवार दोनों को सत्ता के केंद्र से दूर कर दिया।

आज हालात यह हैं कि बारामती में शरद पवार खुद को असहाय स्थिति में पाते हैं और उसी मुंबई में उद्धव ठाकरे राजनीतिक रूप से अकेले नजर आते हैं, जहां कभी बालासाहेब ठाकरे के एक इशारे पर हजारों लोगों को शहर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ता था।

विधानसभा चुनाव में मिली जीत फड़नवीस की राजनीतिक चतुराई का प्रमाण थी, तो उसके बाद का जनादेश मराठी समाज में उनकी व्यापक स्वीकार्यता का संकेत। महाराष्ट्र ने अब उन्हें अपने नेता के रूप में स्वीकार कर लिया है। वे मौजूदा मराठी नेताओं की कतार से ऊपर की लीग में पहुंच चुके हैं।

अब तक, उन्होंने जिसे देखा है, जिसे चाहा है—उसे हासिल किया है। और जिस जुनून के साथ वे भविष्य का ब्लूप्रिंट पेश करते हैं, यदि उसी ऊर्जा से वे मुंबई का कायाकल्प कर पाए, तो उनके सामने पूरा आसमान खुला है—फतह करने के लिए।
और नया पुराने