लेखक : डॉ. धीरेन्द्र मिश्र (चिकित्सक एवं विश्लेषक)
भारत ऐसे समय में खड़ा है जब पूरी दुनिया अभूतपूर्व अनिश्चितताओं से गुजर रही है ।
पूर्वी यूरोप में युद्ध, पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ता संघर्ष, इंडो-पैसिफिक में शक्ति संतुलन की प्रतिस्पर्धा, चीन-ताइवान तनाव, आतंकवाद, साइबर युद्ध, वैश्विक आर्थिक मंदी, ऊर्जा संकट, जलवायु परिवर्तन, सप्लाई चेन का टूटना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से बदलती अर्थव्यवस्था और बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा—ये केवल समाचारों की सुर्खियाँ नहीं हैं; ये आने वाले दशकों की दिशा तय करने वाली वास्तविक चुनौतियाँ हैं।
ऐसे दौर में किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति केवल उसकी सेना, अर्थव्यवस्था या तकनीक नहीं होती, बल्कि उसकी आंतरिक स्थिरता, सामाजिक एकता और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास होता है।
भारत का लोकतंत्र पूर्ण नहीं है—कोई भी लोकतंत्र पूर्ण नहीं होता। सरकारें भी आलोचना से परे नहीं हैं। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि परिवर्तन का रास्ता मतपेटी (Ballot) से निकलता है, अराजकता (Anarchy) से नहीं।
यदि किसी नागरिक को सरकार से असहमति है, तो संविधान उसे बोलने, लिखने, विरोध करने और चुनाव लड़ने का अधिकार देता है। लेकिन जब किसी जनभावना या सामाजिक मुद्दे को राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का मंच बना दिया जाता है, तब सबसे पहले उसी मुद्दे की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। इतिहास गवाह है कि कई जनआंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटककर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम बन गए।
सहानुभूति तब तक रहती है जब तक संघर्ष जनता के हित के लिए दिखाई देता है। जैसे ही लोगों को यह महसूस होने लगता है कि आंदोलन किसी राजनीतिक एजेंडे का साधन बन रहा है, जनसमर्थन स्वाभाविक रूप से कम होने लगता है।
भारत ने पिछले दशकों में अनेक आंदोलनों, राजनीतिक उथल-पुथल और सत्ता परिवर्तन देखे हैं। हर बार अंततः निर्णय जनता ने मतदान के माध्यम से दिया है। यही लोकतंत्र की आत्मा है।
हमारे पड़ोस के उदाहरण भी यह याद दिलाते हैं कि जब राजनीतिक अस्थिरता लंबी हो जाती है, तो उसका असर केवल सरकार पर नहीं, बल्कि निवेश, रोजगार, पर्यटन, शिक्षा, मुद्रा, कानून-व्यवस्था और आम नागरिक के जीवन पर पड़ता है। आर्थिक विकास का पहिया सबसे पहले धीमा होता है, और उसका बोझ अंततः गरीब और मध्यम वर्ग उठाते हैं।
आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ निवेश के लिए सुरक्षित, स्थिर और अनुमानित देशों की तलाश में हैं। यदि भारत को आने वाले वर्षों में विनिर्माण, तकनीक, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, AI, हरित ऊर्जा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का प्रमुख केंद्र बनना है, तो सबसे पहले हमें अपनी लोकतांत्रिक और संस्थागत स्थिरता बनाए रखनी होगी।
सरकारें आएँगी और जाएँगी। नेता बदलेंगे। नीतियाँ बदलेंगी। लेकिन राष्ट्र स्थायी है। संविधान स्थायी है। लोकतांत्रिक संस्थाएँ स्थायी हैं।
इसलिए सरकार का समर्थन करना या विरोध करना व्यक्तिगत और लोकतांत्रिक अधिकार है। परंतु किसी भी राजनीतिक मतभेद को राष्ट्र की स्थिरता, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय हित से ऊपर रखना दूरदर्शिता नहीं कहलाएगा।
भारत की शक्ति उसकी विविधता में है, उसकी लोकतांत्रिक परंपरा में है, उसकी न्यायिक व्यवस्था में है, उसके संविधान में है और सबसे बढ़कर उसके जागरूक मतदाता में है।
यदि परिवर्तन चाहिए, तो लोकतांत्रिक रास्ता हमेशा खुला है। चुनाव लड़िए, लोगों को विश्वास दिलाइए, बहुमत प्राप्त कीजिए और शासन कीजिए। यही लोकतंत्र की मर्यादा है। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत भी है।
"वतन की फ़िक्र कर नादाँ, मुसीबत आने वाली है;
तेरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में।"
आज जब विश्व अनिश्चितताओं के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है, तब भारत को सबसे अधिक आवश्यकता है—राष्ट्रीय एकता, संवैधानिक मर्यादा, लोकतांत्रिक परिपक्वता, आर्थिक प्रगति और विवेकपूर्ण असहमति की; न कि ऐसी राजनीति की जो मतभेद को वैमनस्य और विरोध को अराजकता में बदल दे।
राष्ट्र पहले। राजनीति बाद में। लोकतंत्र सर्वोपरि।
श्री सोनम वांगचुक को प्रभु राम तिलचट्टों से आज़ाद करके उनको सुखद स्वास्थ्य दे ।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
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