Rohtas: अटूट जनआस्था का केंद्र है मां तुतला भवानी मंदिर, प्राचीन इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम

रोहतास/बिहार। बिहार के रोहतास जिले के तिलौथू प्रखंड स्थित मां तुतला भवानी मंदिर श्रद्धा, आस्था, इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा संगम है। कैमूर पहाड़ियों की सुरम्य घाटी में स्थित यह प्राचीन मंदिर वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, सच्चे मन से मां के दरबार में आने वाले भक्त निराश नहीं लौटते हैं। शारदीय नवरात्र के अवसर पर यहां श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ उमड़ती है। मंदिर परिसर और आसपास का मनोरम प्राकृतिक वातावरण इस धार्मिक स्थल को विशिष्ट पहचान प्रदान करता है।

1158 ईस्वी के शिलालेखों में दर्ज है मंदिर का इतिहास

मां तुतला भवानी मंदिर का ऐतिहासिक महत्व यहां मौजूद प्राचीन शिलालेखों से भी स्पष्ट होता है। मान्यता और उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, राजा प्रतापध्वल देव द्वारा लिखवाए गए दो शिलालेख आज भी यहां मौजूद हैं। पहले शिलालेख में 19 अप्रैल 1158 ईस्वी को महिषासुर मर्दिनी की अष्टभुजी प्रतिमा स्थापित किए जाने का उल्लेख मिलता है। दूसरे शिलालेख में राजा की पत्नी सुल्ही, उनके भाई त्रिभुवन धवल देव, पुत्र बिक्रमध्वल देव और साहसध्वल देव तथा पांच पुत्रियों के साथ पूजा-अर्चना किए जाने का वर्णन है। ये शिलालेख मंदिर की प्राचीन धार्मिक परंपरा और ऐतिहासिक विरासत को रेखांकित करते हैं।

नवरात्र और सावन में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

मां तुतला भवानी मंदिर में शारदीय नवरात्र की नवमी और श्रावण पूर्णिमा का विशेष धार्मिक महत्व है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, तिलौथू प्रखंड के कई गांवों के लोग इन अवसरों पर पहले मां तुतला भवानी की पूजा-अर्चना करते हैं, इसके बाद अपने कुलदेवता की आराधना करते हैं। श्रावण मास में पूरे महीने मेला लगता है, जबकि शारदीय नवरात्र के दौरान नौ दिनों तक मेले का आयोजन होता है। इन अवसरों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

भ्रामरी देवी से जुड़ी है स्थानीय मान्यता

मंदिर को लेकर कई प्राचीन लोककथाएं और मान्यताएं प्रचलित हैं। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, मंदिर में अशुद्ध विचारों के साथ आने वाले व्यक्ति को भ्रामरी देवी के प्रकोप का सामना करना पड़ता है। इसी तरह नवरात्र की नवमी की मध्यरात्रि में मंदिर परिसर में परियों द्वारा नृत्य-गीत के साथ पूजा-अर्चना किए जाने की किवदंती भी प्रचलित है। मंदिर में बकरे की बलि देने की परंपरा भी बताई जाती है। ये मान्यताएं स्थानीय धार्मिक लोकविश्वास और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं का हिस्सा हैं।

तुतराही जलप्रपात के बीच स्थापित है मां की प्रतिमा

मां तुतला भवानी मंदिर की सबसे आकर्षक विशेषताओं में से एक यहां का प्राकृतिक सौंदर्य है। महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा तुतराही जलप्रपात के मध्य स्थित है। कैमूर पहाड़ियों की घाटी, चट्टानों से बहता पानी और चारों ओर फैली हरियाली इस स्थान को मनोरम बनाती है। मंदिर के आसपास का दृश्य श्रद्धालुओं के साथ-साथ प्रकृति प्रेमियों को भी आकर्षित करता है। पुरातत्ववेत्ता डॉ. श्याम सुंदर तिवारी ने इस क्षेत्र के प्राकृतिक सौंदर्य को बिहार के विशिष्ट प्राकृतिक स्थलों में शामिल माना है।

कैसे पहुंचें मां तुतला भवानी मंदिर

मां तुतला भवानी मंदिर पहुंचने के लिए निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन डेहरी-ऑन-सोन बताया जाता है। वहीं, रामडिहरा-ऑन-सोन निकटवर्ती बस पड़ाव है, जो डेहरी-यदुनाथपुर मार्ग पर स्थित है। यहां से कैमूर पहाड़ी की घाटी की ओर लगभग पांच किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। इस मार्ग पर ऑटो रिक्शा उपलब्ध होने की जानकारी दी गई है। मंदिर से करीब 100 मीटर की दूरी तक सड़क बनी हुई है। रोहतास जिला मुख्यालय सासाराम से मंदिर की दूरी लगभग 25 किलोमीटर है।

मां तुतला भवानी मंदिर धार्मिक आस्था, मध्यकालीन इतिहास और प्राकृतिक विरासत का ऐसा संगम है, जो रोहतास जिले की सांस्कृतिक पहचान को समृद्ध करता है। नवरात्र के अवसर पर यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह स्थल पूजा-अर्चना के साथ-साथ क्षेत्र की प्राचीन परंपराओं और प्राकृतिक सुंदरता को करीब से देखने का अवसर भी प्रदान करता है।
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