नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों ने हाल के दिनों में ऐतिहासिक ऊंचाई छू ली है। घरेलू बाजार में भाव 1 लाख 76 हजार रुपये प्रति 10 ग्राम तक पहुंचने की चर्चा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक समीकरणों में बदलाव के चलते आने वाले समय में सोने की कीमतों में बड़ी नरमी देखी जा सकती है और यह फिर से 1 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के नीचे आ सकता है।
रूस-अमेरिका समीकरण बना सकते हैं नया ट्रेंड
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच डॉलर में व्यापार को लेकर संभावित सहमति बनती है और रूस दोबारा बड़े पैमाने पर अमेरिकी डॉलर का उपयोग शुरू करता है, तो वैश्विक बाजार में डॉलर की स्थिति मजबूत होगी। इससे सोने को “सेफ हेवन” निवेश के रूप में खरीदने की होड़ कम हो सकती है।
पिछले कुछ वर्षों में रूस सहित कई देशों ने अमेरिकी प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक तनाव के चलते डॉलर पर निर्भरता घटाने की रणनीति अपनाई थी। इस दौरान उन्होंने अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर का हिस्सा घटाकर सोने का हिस्सा बढ़ाया।
BRICS देशों की रणनीति और सोने की बढ़ती मांग
BRICS देशों—ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका—ने भी डॉलर निर्भरता कम करने की दिशा में कदम बढ़ाए। इन देशों ने अपने रिजर्व में सोने की हिस्सेदारी बढ़ाई। आंकड़ों के अनुसार, अब BRICS देशों के पास दुनिया के कुल सोना भंडार का लगभग 20% हिस्सा है।
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में 2005 में सोने की हिस्सेदारी जहां करीब 4.3% थी, वहीं 2025 तक यह बढ़कर लगभग 15% तक पहुंच गई। इसी तरह ब्राजील ने 2025 में 16 टन सोना खरीदा, जबकि इससे पहले चार वर्षों तक उसने कोई नई खरीदारी नहीं की थी।
ट्रंप युग के टैरिफ और वैश्विक अस्थिरता
पिछले वर्ष डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका द्वारा आयात शुल्क (टैरिफ) बढ़ाने की नीतियों ने वैश्विक व्यापारिक माहौल में अनिश्चितता पैदा कर दी। इससे कई देशों के केंद्रीय बैंकों ने सुरक्षा की दृष्टि से सोने की खरीद बढ़ा दी। आर्थिक अस्थिरता, भू-राजनीतिक तनाव और मुद्रास्फीति की आशंकाओं ने भी सोने की कीमतों को ऊपर धकेला।
क्या सचमुच सस्ता होगा सोना?
अब यदि रूस और अमेरिका के बीच डॉलर आधारित व्यापारिक समझौता होता है, तो यह संकेत देगा कि वैश्विक स्तर पर डॉलर की स्वीकार्यता फिर से मजबूत हो रही है। ऐसे में अन्य देश भी सोने की अतिरिक्त खरीद से पीछे हट सकते हैं। मांग में कमी आने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में गिरावट संभव है।
हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि सोने की कीमतें केवल एक कारक पर निर्भर नहीं करतीं। वैश्विक ब्याज दरें, मुद्रास्फीति, भू-राजनीतिक तनाव और केंद्रीय बैंकों की नीतियां भी अहम भूमिका निभाती हैं।
फिलहाल निवेशक और बाजार विश्लेषक रूस-अमेरिका संबंधों में संभावित बदलाव पर नजर बनाए हुए हैं। आने वाले महीनों में वैश्विक कूटनीति और आर्थिक नीतियां तय करेंगी कि सोना अपनी ऐतिहासिक ऊंचाई बरकरार रखेगा या फिर कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिलेगी।
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