हेल्थ बजट बढ़ा, सवाल वही, क्या इलाज की गुणवत्ता सुधरेगी?

नई दिल्ली। यूनियन बजट में केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र को लेकर एक बार फिर बड़ा दावा किया है। वित्त वर्ष के लिए हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर मंत्रालय को 1.05 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है, जो पिछले साल की तुलना में करीब 9 प्रतिशत अधिक है। कागजों पर यह बढ़ोतरी राहत देने वाली जरूर दिखती है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बजट से आम लोगों को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण इलाज मिल पाएगा?

आंकड़े बताते हैं कि भारत अपनी कुल जीडीपी का केवल 3.31 प्रतिशत हिस्सा ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है। यह खर्च चीन, नेपाल, भूटान और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों से भी कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक जीडीपी का कम से कम 5 से 6 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च नहीं किया जाएगा, तब तक व्यवस्था में ठोस सुधार की उम्मीद करना मुश्किल है।

देश की स्वास्थ्य स्थिति की जमीनी हकीकत और भी चिंताजनक है। रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में केवल करीब 5 प्रतिशत आबादी ही ऐसी है, जो क्वालिटी हेल्थ केयर को आसानी से अफोर्ड कर पाती है। लगभग 75 प्रतिशत लोग अच्छे इलाज से बहुत दूर हैं, जबकि शेष 20 प्रतिशत लोग जैसे-तैसे इलाज की व्यवस्था कर पाते हैं। इसका सीधा मतलब है कि बहुसंख्यक आबादी आज भी महंगे निजी अस्पतालों या सीमित सरकारी सुविधाओं के बीच फंसी हुई है।

पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाई है, एमबीबीएस की सीटों में इजाफा किया गया है और नर्सिंग स्टाफ की भर्तियां भी हुई हैं। इन कदमों से यह उम्मीद जगी थी कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत होगी। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि सुविधाएं बढ़ने के बावजूद इलाज की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नजर नहीं आ रहा है।

रिपोर्ट्स की मानें तो भारत में अस्पताल और डॉक्टरों तक पहुंच तो पहले से बेहतर हुई है, लेकिन इलाज की गुणवत्ता कमजोर बनी हुई है। यानी मरीज अस्पताल तो पहुंच रहा है, डॉक्टर भी उपलब्ध है, लेकिन सही समय पर सही इलाज नहीं मिल पा रहा। दवाओं की कमी, जांच सुविधाओं का अभाव और भीड़भाड़ जैसे कारण इलाज को प्रभावित कर रहे हैं।

भारत की आबादी लगभग 140 करोड़ है और औसतन एक भारतीय की जीवन प्रत्याशा करीब 70 वर्ष है। वहीं, चीन की आबादी भी लगभग इतनी ही है, लेकिन वहां औसत जीवन प्रत्याशा 80 वर्ष तक पहुंच चुकी है। यानी एक चीनी नागरिक औसतन भारतीय से करीब 10 साल ज्यादा जी रहा है। यह अंतर साफ तौर पर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और सरकारी निवेश की तस्वीर पेश करता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि बढ़े हुए हेल्थ बजट का असली फायदा आम आदमी तक कैसे पहुंचेगा। क्या यह राशि केवल आंकड़ों तक सीमित रह जाएगी या इससे वास्तव में सरकारी अस्पतालों की हालत सुधरेगी, इलाज सस्ता और बेहतर होगा, इसका जवाब आने वाला समय ही देगा।
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