
नई दिल्ली। सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के पार्लियामेंट्री बोर्ड के चेयरमैन सैयद तहसीन अहमद ने सोमवार को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में केंद्र सरकार पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों में गठित की जाने वाली समता कमिटियों में मुसलमानों के पसमांदा समाज को भी अनिवार्य रूप से प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्तमान में प्रस्तावित UGC के नए बिल के ड्राफ्ट में अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व को लेकर कहीं भी स्पष्ट प्रावधान नहीं किया गया है, जो बेहद चिंताजनक है।
सैयद तहसीन अहमद ने कहा कि शिक्षा जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण क्षेत्र में समानता और सामाजिक न्याय की बात तभी सार्थक हो सकती है, जब सभी वर्गों, विशेषकर अल्पसंख्यकों और पसमांदा तबकों को निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी मिले। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण रूप से UGC का नया बिल केंद्र सरकार की उस सोच को उजागर करता है, जिसमें अल्पसंख्यकों के हितों को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है।
उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि आज देश में अलग-अलग वर्ग अपने अधिकारों को लेकर मुखर हैं, लेकिन मुसलमानों, खासकर पसमांदा समाज के अधिकारों को लेकर न तो सरकार गंभीर है और न ही समाज के अन्य प्रभावशाली वर्ग कोई चिंता दिखा रहे हैं। यह स्थिति लोकतंत्र और सामाजिक समरसता दोनों के लिए घातक है।
सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के नेता ने यह भी कहा कि इससे भी अधिक दुखद पहलू यह है कि जो नेता खुद को मुसलमानों का रहनुमा बताकर वर्षों से मुसलमानों के वोट लेते आ रहे हैं, वे भी इस बिल में मुसलमानों की हो रही हकमारी पर चुप्पी साधे हुए हैं। उनका यह मौन मुसलमानों के साथ विश्वासघात के समान है।
सैयद तहसीन अहमद ने स्पष्ट किया कि सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) इस मुद्दे को लेकर पीछे हटने वाली नहीं है। उन्होंने घोषणा की कि समता कमिटी में अल्पसंख्यकों, विशेषकर पसमांदा मुसलमानों को उचित प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए पार्टी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करेगी, ताकि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।
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