पूर्णिया के एमबीए पास युवा ने 10 लाख रुपये के बैंक ऋण से शुरू किया व्यवसाय, आज करीब 40 परिवारों की आजीविका का बने सहारा
पूर्णिया/बिहार, 29 अक्टूबर 2026। कोरोना महामारी ने जहां कई लोगों की नौकरियां छीन लीं और परिवारों को आर्थिक संकट में डाल दिया, वहीं पूर्णिया के युवा सत्यम सुंदरम ने इसी मुश्किल दौर को अपने जीवन का नया अवसर बना लिया। माता-पिता की गंभीर बीमारी, इलाज में जमा पूंजी खर्च होने और नौकरी छूटने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) के तहत बैंक से 10 लाख रुपये का ऋण लेकर उन्होंने बांस से बने उत्पादों का कारोबार शुरू किया। आज उनके उद्यम मणिपुरी बैंबू आर्किटेक्चर से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 40 परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है।
सत्यम की यह सफलता केवल एक व्यवसाय खड़ा करने की कहानी नहीं है, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में हौसला बनाए रखने, नए अवसर तलाशने और परिवार के विश्वास को अपनी ताकत बनाने की प्रेरक मिसाल भी है।
पूर्णिया/बिहार, 29 अक्टूबर 2026। कोरोना महामारी ने जहां कई लोगों की नौकरियां छीन लीं और परिवारों को आर्थिक संकट में डाल दिया, वहीं पूर्णिया के युवा सत्यम सुंदरम ने इसी मुश्किल दौर को अपने जीवन का नया अवसर बना लिया। माता-पिता की गंभीर बीमारी, इलाज में जमा पूंजी खर्च होने और नौकरी छूटने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) के तहत बैंक से 10 लाख रुपये का ऋण लेकर उन्होंने बांस से बने उत्पादों का कारोबार शुरू किया। आज उनके उद्यम मणिपुरी बैंबू आर्किटेक्चर से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 40 परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है।
सत्यम की यह सफलता केवल एक व्यवसाय खड़ा करने की कहानी नहीं है, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में हौसला बनाए रखने, नए अवसर तलाशने और परिवार के विश्वास को अपनी ताकत बनाने की प्रेरक मिसाल भी है।
नौकरी छूटने के बाद चुना स्वरोजगार का रास्ता
पूर्णिया के रहने वाले सत्यम सुंदरम के पिता चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी हैं। सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद परिवार ने उनकी शिक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ी। सत्यम ने प्रारंभिक पढ़ाई पूर्णिया में की और आगे की शिक्षा के लिए पटना तथा कोलकाता गए। उन्होंने बीसीए के बाद एमबीए की पढ़ाई पूरी की।
पढ़ाई के दौरान ही उनके मन में पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ उत्पादों का व्यवसाय शुरू करने का विचार आया। उन्होंने बांस से बनने वाले विभिन्न सामानों, उनकी निर्माण प्रक्रिया और बाजार में उनकी मांग की संभावनाओं का अध्ययन किया। इंटर्नशिप के दौरान बेहतर प्रदर्शन के आधार पर उन्हें प्री-प्लेसमेंट ऑफर भी मिला और बाद में कंपनी में नौकरी मिल गई।
लेकिन वर्ष 2020 में कोरोना महामारी ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। उनके माता-पिता दोनों गंभीर रूप से बीमार हो गए। ऐसे समय में सत्यम को नौकरी छोड़कर पूर्णिया लौटना पड़ा, ताकि वह माता-पिता की देखभाल कर सकें। इसी दौरान उनकी नौकरी भी चली गई। परिवार की जमा पूंजी इलाज में खर्च हो गई और आर्थिक स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण बन गई।
पूर्णिया के रहने वाले सत्यम सुंदरम के पिता चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी हैं। सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद परिवार ने उनकी शिक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ी। सत्यम ने प्रारंभिक पढ़ाई पूर्णिया में की और आगे की शिक्षा के लिए पटना तथा कोलकाता गए। उन्होंने बीसीए के बाद एमबीए की पढ़ाई पूरी की।
पढ़ाई के दौरान ही उनके मन में पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ उत्पादों का व्यवसाय शुरू करने का विचार आया। उन्होंने बांस से बनने वाले विभिन्न सामानों, उनकी निर्माण प्रक्रिया और बाजार में उनकी मांग की संभावनाओं का अध्ययन किया। इंटर्नशिप के दौरान बेहतर प्रदर्शन के आधार पर उन्हें प्री-प्लेसमेंट ऑफर भी मिला और बाद में कंपनी में नौकरी मिल गई।
लेकिन वर्ष 2020 में कोरोना महामारी ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। उनके माता-पिता दोनों गंभीर रूप से बीमार हो गए। ऐसे समय में सत्यम को नौकरी छोड़कर पूर्णिया लौटना पड़ा, ताकि वह माता-पिता की देखभाल कर सकें। इसी दौरान उनकी नौकरी भी चली गई। परिवार की जमा पूंजी इलाज में खर्च हो गई और आर्थिक स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण बन गई।
तीन हजार रुपये के निवेश से शुरू हुआ सफर
मुश्किल हालात में सत्यम ने एमबीए के दौरान सोचे गए बांस के उत्पादों के कारोबार को जमीन पर उतारने का फैसला किया। इसी क्रम में उन्हें समाचार पत्र के माध्यम से प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम की जानकारी मिली।
व्यवसाय की संभावनाओं को समझने के लिए वह असम और मणिपुर गए। वहां उन्होंने बांस से बने उत्पादों और उनके निर्माण से जुड़ी जानकारी जुटाई। इसके बाद लगभग तीन हजार रुपये के बांस के सामान खरीदकर पूर्णिया में सड़क किनारे स्टॉल लगाया और बिक्री शुरू कर दी।
करीब तीन महीने तक उन्होंने सड़क किनारे सामान बेचकर ग्राहकों की पसंद, बाजार की मांग और उत्पादों की उपयोगिता को समझने का प्रयास किया। शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन धीरे-धीरे लोगों के बीच बांस से बने पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की मांग बढ़ने लगी।
मुश्किल हालात में सत्यम ने एमबीए के दौरान सोचे गए बांस के उत्पादों के कारोबार को जमीन पर उतारने का फैसला किया। इसी क्रम में उन्हें समाचार पत्र के माध्यम से प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम की जानकारी मिली।
व्यवसाय की संभावनाओं को समझने के लिए वह असम और मणिपुर गए। वहां उन्होंने बांस से बने उत्पादों और उनके निर्माण से जुड़ी जानकारी जुटाई। इसके बाद लगभग तीन हजार रुपये के बांस के सामान खरीदकर पूर्णिया में सड़क किनारे स्टॉल लगाया और बिक्री शुरू कर दी।
करीब तीन महीने तक उन्होंने सड़क किनारे सामान बेचकर ग्राहकों की पसंद, बाजार की मांग और उत्पादों की उपयोगिता को समझने का प्रयास किया। शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन धीरे-धीरे लोगों के बीच बांस से बने पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की मांग बढ़ने लगी।
सरकारी योजना के ऋण से मिला कारोबार बढ़ाने का अवसर
शुरुआती दौर में सत्यम के साथ केवल एक कर्मचारी काम करता था। कारोबार को व्यवस्थित रूप देने और उत्पादन बढ़ाने के लिए उन्हें पूंजी की आवश्यकता थी। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत बैंक से 10 लाख रुपये का ऋण मिलने के बाद उन्होंने अपना छोटा उत्पादन केंद्र शुरू किया।
धीरे-धीरे उनका व्यवसाय आगे बढ़ने लगा और बांस से बने उत्पादों की विविधता के साथ बाजार का दायरा भी बढ़ता गया। सत्यम के मुताबिक, यदि उन्हें इस योजना के तहत ऋण नहीं मिलता, तो उस कठिन दौर में कारोबार शुरू करना और उसे आगे बढ़ाना काफी मुश्किल होता।
उनके लिए यह सहायता केवल आर्थिक पूंजी नहीं थी, बल्कि आत्मनिर्भर बनने और अपने पैरों पर खड़े होने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी साबित हुई।
शुरुआती दौर में सत्यम के साथ केवल एक कर्मचारी काम करता था। कारोबार को व्यवस्थित रूप देने और उत्पादन बढ़ाने के लिए उन्हें पूंजी की आवश्यकता थी। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत बैंक से 10 लाख रुपये का ऋण मिलने के बाद उन्होंने अपना छोटा उत्पादन केंद्र शुरू किया।
धीरे-धीरे उनका व्यवसाय आगे बढ़ने लगा और बांस से बने उत्पादों की विविधता के साथ बाजार का दायरा भी बढ़ता गया। सत्यम के मुताबिक, यदि उन्हें इस योजना के तहत ऋण नहीं मिलता, तो उस कठिन दौर में कारोबार शुरू करना और उसे आगे बढ़ाना काफी मुश्किल होता।
उनके लिए यह सहायता केवल आर्थिक पूंजी नहीं थी, बल्कि आत्मनिर्भर बनने और अपने पैरों पर खड़े होने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी साबित हुई।
मां के विश्वास ने दिया आगे बढ़ने का हौसला
सत्यम की सफलता के पीछे उनकी मां आशा अनुरागिनि का भरोसा और संघर्ष भी अहम रहा है। उन्होंने सीमित संसाधनों के बीच बेटे को पढ़ाया और एमबीए तक की शिक्षा दिलाई। हालांकि, नौकरी छूटने के बाद जब सत्यम ने बांस के उत्पादों का कारोबार शुरू करने का निर्णय लिया, तो परिवार और समाज के कुछ लोगों ने इस पर सवाल उठाए।
आशा अनुरागिनि के अनुसार, कुछ लोग ताना देते थे कि बेटे को एमबीए कराने के बाद उससे बांस का काम कराया जा रहा है। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण उनके पति भी शुरुआत में इस व्यवसाय को लेकर आशंकित थे। लेकिन आशा को अपने बेटे की सोच और मेहनत पर भरोसा था।
प्रकृति से जुड़ाव और पर्यावरण अनुकूल उत्पादों के प्रति उनकी रुचि ने भी उन्हें इस व्यवसाय का समर्थन करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कठिन समय में बेटे का हौसला बढ़ाया और उसे अपने विचार को साकार करने के लिए प्रोत्साहित किया।
आज बेटे की उपलब्धियों को देखकर वह गर्व महसूस करती हैं। उनके मुताबिक, सत्यम की मेहनत ने परिवार को नई पहचान दी है और अब लोग उसकी सफलता का उदाहरण देते हैं।
सत्यम की सफलता के पीछे उनकी मां आशा अनुरागिनि का भरोसा और संघर्ष भी अहम रहा है। उन्होंने सीमित संसाधनों के बीच बेटे को पढ़ाया और एमबीए तक की शिक्षा दिलाई। हालांकि, नौकरी छूटने के बाद जब सत्यम ने बांस के उत्पादों का कारोबार शुरू करने का निर्णय लिया, तो परिवार और समाज के कुछ लोगों ने इस पर सवाल उठाए।
आशा अनुरागिनि के अनुसार, कुछ लोग ताना देते थे कि बेटे को एमबीए कराने के बाद उससे बांस का काम कराया जा रहा है। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण उनके पति भी शुरुआत में इस व्यवसाय को लेकर आशंकित थे। लेकिन आशा को अपने बेटे की सोच और मेहनत पर भरोसा था।
प्रकृति से जुड़ाव और पर्यावरण अनुकूल उत्पादों के प्रति उनकी रुचि ने भी उन्हें इस व्यवसाय का समर्थन करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कठिन समय में बेटे का हौसला बढ़ाया और उसे अपने विचार को साकार करने के लिए प्रोत्साहित किया।
आज बेटे की उपलब्धियों को देखकर वह गर्व महसूस करती हैं। उनके मुताबिक, सत्यम की मेहनत ने परिवार को नई पहचान दी है और अब लोग उसकी सफलता का उदाहरण देते हैं।
बांस के कारोबार से महिलाओं को भी मिला रोजगार
सत्यम का उद्यम केवल उत्पादों के निर्माण और बिक्री तक सीमित नहीं है। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा हुए हैं। फिलहाल उनकी फैक्ट्री में करीब 10 लोग काम करते हैं, जिनमें महिलाएं और पुरुष दोनों शामिल हैं। इसके अलावा, कंपनी से जुड़े लोग अलग-अलग स्थानों पर स्टॉल लगाकर उत्पाद बेचते हैं। इस तरह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 40 परिवार इस कारोबार से जुड़े बताए जाते हैं।
फैक्ट्री में काम करने वाली कारीगर लवली की कहानी भी इस बदलाव को दर्शाती है। वह पहले मधुबनी पेंटिंग और कपड़े से जुड़े छोटे-मोटे काम करती थीं, लेकिन उनसे परिवार का खर्च चलाना मुश्किल था। बाद में वह आशा अनुरागिनि और सत्यम की फैक्ट्री से जुड़ीं और बांस के उत्पाद बनाना सीखा।
यहां रोजगार मिलने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। अब वह अपने बच्चे को निजी स्कूल में पढ़ाने में सक्षम हैं। उनके लिए यह काम केवल कमाई का जरिया नहीं, बल्कि परिवार के भविष्य को बेहतर बनाने का अवसर भी है।
सत्यम का उद्यम केवल उत्पादों के निर्माण और बिक्री तक सीमित नहीं है। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा हुए हैं। फिलहाल उनकी फैक्ट्री में करीब 10 लोग काम करते हैं, जिनमें महिलाएं और पुरुष दोनों शामिल हैं। इसके अलावा, कंपनी से जुड़े लोग अलग-अलग स्थानों पर स्टॉल लगाकर उत्पाद बेचते हैं। इस तरह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 40 परिवार इस कारोबार से जुड़े बताए जाते हैं।
फैक्ट्री में काम करने वाली कारीगर लवली की कहानी भी इस बदलाव को दर्शाती है। वह पहले मधुबनी पेंटिंग और कपड़े से जुड़े छोटे-मोटे काम करती थीं, लेकिन उनसे परिवार का खर्च चलाना मुश्किल था। बाद में वह आशा अनुरागिनि और सत्यम की फैक्ट्री से जुड़ीं और बांस के उत्पाद बनाना सीखा।
यहां रोजगार मिलने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। अब वह अपने बच्चे को निजी स्कूल में पढ़ाने में सक्षम हैं। उनके लिए यह काम केवल कमाई का जरिया नहीं, बल्कि परिवार के भविष्य को बेहतर बनाने का अवसर भी है।
टेंट हाउस के काम से बांस के उत्पाद बनाने तक पहुंचे मुन्ना उरांव
फैक्ट्री में पिछले चार वर्षों से काम कर रहे मुन्ना उरांव भी इस उद्यम से लाभान्वित हुए हैं। उन्होंने बताया कि पहले वह टेंट हाउस में मिस्त्री का काम करते थे। बांस से बने उत्पादों के निर्माण का काम उनके लिए नया था, इसलिए शुरुआत में इसे सीखने में समय लगा।
धीरे-धीरे उन्होंने काम में दक्षता हासिल कर ली और अब कई तरह के उत्पाद बनाने लगे हैं। इस रोजगार से उनके परिवार की आजीविका चल रही है और बच्चों की पढ़ाई भी जारी है।
लवली और मुन्ना उरांव जैसे कारीगरों के अनुभव बताते हैं कि छोटे स्तर पर शुरू हुआ उद्यम स्थानीय लोगों को हुनर सीखने और नियमित आजीविका के अवसर उपलब्ध करा सकता है।
फैक्ट्री में पिछले चार वर्षों से काम कर रहे मुन्ना उरांव भी इस उद्यम से लाभान्वित हुए हैं। उन्होंने बताया कि पहले वह टेंट हाउस में मिस्त्री का काम करते थे। बांस से बने उत्पादों के निर्माण का काम उनके लिए नया था, इसलिए शुरुआत में इसे सीखने में समय लगा।
धीरे-धीरे उन्होंने काम में दक्षता हासिल कर ली और अब कई तरह के उत्पाद बनाने लगे हैं। इस रोजगार से उनके परिवार की आजीविका चल रही है और बच्चों की पढ़ाई भी जारी है।
लवली और मुन्ना उरांव जैसे कारीगरों के अनुभव बताते हैं कि छोटे स्तर पर शुरू हुआ उद्यम स्थानीय लोगों को हुनर सीखने और नियमित आजीविका के अवसर उपलब्ध करा सकता है।
पूर्णिया से देश के विभिन्न राज्यों तक पहुंच रहे उत्पाद
सत्यम सुंदरम का कारोबार अब शुरुआती स्थानीय बाजार से आगे निकल चुका है। उनके बांस से बने उत्पाद पूर्णिया के अलावा कटिहार, दानापुर और हाजीपुर सहित विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर लगाए गए स्टॉलों के माध्यम से ग्राहकों तक पहुंच रहे हैं।
उनके उत्पाद देश के कई राज्यों में भेजे जा रहे हैं और अब विदेशों में भी इनकी आपूर्ति शुरू होने की जानकारी दी गई है। कारोबार के विस्तार के साथ उन्होंने ऐसे लोगों के लिए भी अवसर तैयार किए हैं, जो कम पूंजी में अपना छोटा व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं।
सत्यम से जुड़े कुछ लोग उनसे उत्पाद खरीदकर अलग-अलग जगहों पर स्टॉल लगाते हैं और उनकी बिक्री से आमदनी करते हैं। इस प्रकार उनका व्यवसाय केवल अपनी फैक्ट्री तक सीमित न रहकर छोटे कारोबारियों के लिए भी कमाई का माध्यम बन रहा है।
सत्यम सुंदरम का कारोबार अब शुरुआती स्थानीय बाजार से आगे निकल चुका है। उनके बांस से बने उत्पाद पूर्णिया के अलावा कटिहार, दानापुर और हाजीपुर सहित विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर लगाए गए स्टॉलों के माध्यम से ग्राहकों तक पहुंच रहे हैं।
उनके उत्पाद देश के कई राज्यों में भेजे जा रहे हैं और अब विदेशों में भी इनकी आपूर्ति शुरू होने की जानकारी दी गई है। कारोबार के विस्तार के साथ उन्होंने ऐसे लोगों के लिए भी अवसर तैयार किए हैं, जो कम पूंजी में अपना छोटा व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं।
सत्यम से जुड़े कुछ लोग उनसे उत्पाद खरीदकर अलग-अलग जगहों पर स्टॉल लगाते हैं और उनकी बिक्री से आमदनी करते हैं। इस प्रकार उनका व्यवसाय केवल अपनी फैक्ट्री तक सीमित न रहकर छोटे कारोबारियों के लिए भी कमाई का माध्यम बन रहा है।
आत्मनिर्भरता की दिशा में युवाओं के लिए प्रेरणा
सत्यम सुंदरम का सफर बताता है कि कठिन परिस्थितियों में भी नए रास्ते तलाशे जा सकते हैं। नौकरी छूटने और परिवार पर आर्थिक संकट आने के बाद उन्होंने परिस्थितियों के सामने हार मानने के बजाय अपने विचार को व्यवसाय में बदलने का प्रयास किया। शुरुआती दौर में सड़क किनारे उत्पाद बेचने से लेकर उत्पादन केंद्र स्थापित करने और कारोबार को दूसरे राज्यों तक पहुंचाने तक का उनका सफर निरंतर मेहनत का परिणाम है।
प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत मिले बैंक ऋण ने उन्हें व्यवसाय शुरू करने के लिए जरूरी पूंजी उपलब्ध कराई। वहीं, उनकी मेहनत, बाजार की जरूरतों को समझने की क्षमता और परिवार के सहयोग ने इस अवसर को उद्यम में बदलने में भूमिका निभाई।
आज सत्यम सुंदरम का बांस कारोबार पर्यावरण अनुकूल उत्पादों को बढ़ावा देने के साथ-साथ रोजगार सृजन और स्वरोजगार की संभावनाओं को भी सामने रखता है। उनकी कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो नौकरी की अनिश्चितता के बीच अपना काम शुरू करना चाहते हैं और सीमित संसाधनों के बावजूद आत्मनिर्भर बनने का सपना देखते हैं।
सत्यम सुंदरम का सफर बताता है कि कठिन परिस्थितियों में भी नए रास्ते तलाशे जा सकते हैं। नौकरी छूटने और परिवार पर आर्थिक संकट आने के बाद उन्होंने परिस्थितियों के सामने हार मानने के बजाय अपने विचार को व्यवसाय में बदलने का प्रयास किया। शुरुआती दौर में सड़क किनारे उत्पाद बेचने से लेकर उत्पादन केंद्र स्थापित करने और कारोबार को दूसरे राज्यों तक पहुंचाने तक का उनका सफर निरंतर मेहनत का परिणाम है।
प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत मिले बैंक ऋण ने उन्हें व्यवसाय शुरू करने के लिए जरूरी पूंजी उपलब्ध कराई। वहीं, उनकी मेहनत, बाजार की जरूरतों को समझने की क्षमता और परिवार के सहयोग ने इस अवसर को उद्यम में बदलने में भूमिका निभाई।
आज सत्यम सुंदरम का बांस कारोबार पर्यावरण अनुकूल उत्पादों को बढ़ावा देने के साथ-साथ रोजगार सृजन और स्वरोजगार की संभावनाओं को भी सामने रखता है। उनकी कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो नौकरी की अनिश्चितता के बीच अपना काम शुरू करना चाहते हैं और सीमित संसाधनों के बावजूद आत्मनिर्भर बनने का सपना देखते हैं।
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