पांडित्य परंपरा के ध्रुवतारा : ‘काशी के कालिदास’ महामहोपाध्याय पंडित रेवा प्रसाद द्विवेदी

नई दिल्ली, 22 अगस्त 2025। भारतीय विद्या, संस्कृति और साहित्य के विशाल आकाश में एक ऐसा सूर्य उदित हुआ, जिसने न केवल काशी की प्राचीन पांडित्य परंपरा को नया जीवन दिया, बल्कि उसे वैश्विक स्तर पर गौरव दिलाया। यह सूर्य थे महामहोपाध्याय पंडित रेवा प्रसाद द्विवेदी, जिन्हें उनके असाधारण ज्ञान, काव्य प्रतिभा और गहन संस्कृत साधना के लिए सम्मानपूर्वक ‘काशी के कालिदास’ की उपाधि से अलंकृत किया गया।

22 अगस्त 1935 को मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के नांदेड़ गाँव में जन्मे पंडित द्विवेदी बचपन से ही अद्भुत मेधावी और संस्कृत भाषा के प्रति समर्पित रहे। प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद उनका हृदय और मस्तिष्क काशी की ओर खिंच आया। 1950 में वे जब काशी पहुँचे तो वहां की विद्वत परंपरा ने उन्हें जैसे अपना लिया। धीरे-धीरे उन्होंने उस परंपरा को आत्मसात किया और फिर अपनी प्रतिभा से उसे नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में उन्होंने लंबे समय तक अध्यापन और शोध कार्य किया। वे विभागाध्यक्ष और संकाय के प्रमुख भी रहे। उनकी कक्षाएं केवल पाठ नहीं, बल्कि ज्ञान का अद्भुत उत्सव होती थीं। कठिन से कठिन शास्त्रीय ग्रंथों और संस्कृत के गूढ़ श्लोकों को वे इतनी सरलता से समझाते कि साधारण विद्यार्थी भी सहजता से उसका मर्म ग्रहण कर लेता।

उनकी साहित्य साधना का सबसे विराट आयाम है ‘स्वातंत्र्यसंभवम्’—103 सर्गों में विस्तृत यह महान संस्कृत महाकाव्य भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की महागाथा का दर्पण है। यह अद्वितीय कृति संस्कृत साहित्य में अपनी तरह की अकेली रचना मानी जाती है। इसके लिए उन्हें 1991 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से अलंकृत किया गया। इसके अतिरिक्त उन्होंने तीन महाकाव्य, बीस खंडकाव्य, दो नाटक और छह मौलिक साहित्यशास्त्रीय ग्रंथों की रचना कर संस्कृत साहित्य को अप्रतिम समृद्धि दी।

पंडित द्विवेदी को राष्ट्रपति पुरस्कार (1979), उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान का विश्व भारती सम्मान और कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए। लेकिन इन सम्मानों से भी कहीं बड़ा था उनका जीवंत योगदान—संस्कृत साहित्य के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए किए गए उनके कार्य।

वे केवल रचनाकार ही नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और संगठनकर्ता भी थे। काशी विद्वत परिषद के संगठन मंत्री के रूप में उन्होंने परिषद की बौद्धिक ऊँचाइयों को विस्तृत किया। उनके सान्निध्य में 90 से अधिक शोधार्थियों ने पीएचडी और शोध कार्य पूरे किए, जो आज विश्वभर में भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। उन्होंने सैकड़ों शोधपत्र और ग्रंथ संपादित किए, जिनसे संस्कृत साहित्य को नई ऊर्जा मिली।

विशेष उल्लेखनीय है कि वे परंपरा और आधुनिकता का अद्वितीय संगम थे। संस्कृत के गूढ़ शास्त्रों में रचे-बसे होने के बावजूद वे आधुनिक तकनीक और साधनों के उपयोग में संकोच नहीं करते थे। अपने शोध, लेखन और संपादन में उन्होंने समयानुकूल साधनों का प्रयोग किया, जो उस युग में विद्वानों में अत्यंत दुर्लभ था।

पंडित रेवा प्रसाद द्विवेदी का निधन 21 मई 2021 को हुआ, किंतु उनकी रचनाएं, उनके शिष्य और उनकी स्थापित परंपरा आज भी जीवित हैं और संस्कृत साहित्य के पथप्रदर्शक बने हुए हैं। उनकी विद्वता, उनकी शैली और उनकी साधना आने वाली पीढ़ियों को सदा प्रेरित करती रहेगी।

वास्तव में, वे केवल काशी के कालिदास ही नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा के उस अमर दीपस्तंभ थे, जिसकी ज्योति आज भी भारतीय संस्कृति और संस्कृत साहित्य को आलोकित कर रही है।
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