सहरसा/बिहार, 22 अगस्त 2025। “जब परंपरा और आधुनिकता मिल जाती है, तो एक नई कहानी जन्म लेती है।” यह पंक्ति सहरसा नगर निगम क्षेत्र के वार्ड-24 पटुआहा की बसंती कुमारी और उनकी सास ललिता देवी पर बिल्कुल सटीक बैठती है। परंपरागत ‘बरी’ (बड़ी) बनाने के हुनर को प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (पीएमएफएमई) की मदद से संगठित और आधुनिक रूप देकर उन्होंने न केवल आत्मनिर्भरता की राह पकड़ी, बल्कि आसपास की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन गईं।
• सास से मिली सीख, बहू ने दी आधुनिक पहचान
ललिता देवी ने वर्ष 1980 से लेकर 2023 तक घर पर ही उड़द, मटर और मूंग की बरी बनाकर छोटे स्तर पर बिक्री की। उस समय यह केवल घरेलू जरूरत और सीमित आमदनी का साधन था। लेकिन बहू बसंती ने इस पारंपरिक व्यवसाय में संभावनाएं देखीं और इसे बड़े पैमाने पर स्वरोजगार का जरिया बनाने का निश्चय किया। अक्टूबर 2024 में दोनों ने मिलकर इस काम को संगठित रूप दिया। आज यह सास-बहू की जोड़ी सहरसा ही नहीं, बल्कि बिहार के महिला उद्यमिता की एक जीवंत मिसाल बन चुकी है।
• 12 तरह की बरी, बिहार से दक्षिण भारत तक पहचान
जहाँ पहले केवल साधारण दाल की बरी बनाई जाती थी, वहीं अब यह परिवार 12 प्रकार की बरी तैयार कर रहा है। मसूर बरी, उड़द बरी, मटर बरी, चना बरी, मूंग बरी, मिक्स दाल बरी के साथ-साथ उन्होंने स्वाद और पोषण को जोड़ते हुए चना गरम मसाला मिक्स बरी, मसूर गरम मसाला मिक्स बरी, उड़द गरम मसाला मिक्स बरी, चुकंदर मिक्स बरी, अदरक मिक्स बरी और गाजर मिक्स बरी जैसे नवाचार किए हैं।
आज इनके उत्पाद केवल सहरसा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दक्षिण भारत तक अपनी पहचान बना चुके हैं। यही नहीं, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जैसे अमेज़न, फ्लिपकार्ट और मीशो के माध्यम से भी इनकी बिक्री हो रही है, जिससे स्थानीय उत्पाद अब राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच बना रहे हैं।
• पीएमएफएमई योजना से मिला सहारा
बसंती कुमारी ने बताया कि प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना से उन्हें 10 लाख रुपये की सहायता मिली। इस वित्तीय मदद से उन्होंने न केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाई, बल्कि मशीनरी खरीदकर काम को आधुनिक रूप दिया। इससे उत्पादन की मात्रा और गुणवत्ता दोनों में सुधार हुआ। अब रोजाना लगभग 50 किलो सामग्री से 5 हजार रुपये तक का कारोबार हो रहा है।
महिला सशक्तिकरण की मिसाल
सबसे खास बात यह है कि इस व्यवसाय ने सिर्फ बसंती और उनके परिवार को आत्मनिर्भर नहीं बनाया, बल्कि आसपास की 6 महिलाओं को भी रोजगार दिया है। ये महिलाएं दैनिक मजदूरी पर काम कर रही हैं और अपने परिवार की आय में योगदान कर रही हैं। इस प्रकार यह व्यवसाय महिला सशक्तिकरण और सामूहिक विकास का भी साधन बन चुका है।
• सफलता की प्रेरक कहानी
बसंती कहती हैं—“मेरी सास 1980 से यह काम कर रही थीं। उसी परंपरा से मुझे प्रेरणा मिली। परिवार के साथ बैठकर हमने तय किया कि इस कार्य को बड़े स्तर पर किया जा सकता है। इसके बाद मशीन खरीदी गई, ब्रांडिंग और मार्केटिंग शुरू की गई। आज हम इस मुकाम पर हैं।”
ललिता देवी भी अपनी बहू पर गर्व करती हैं। उनका मानना है कि सही मार्गदर्शन और सरकारी योजना की मदद मिलने पर छोटे-छोटे घरेलू काम भी रोजगार और उद्यमिता का बड़ा जरिया बन सकते हैं।
बसंती कुमारी और ललिता देवी की यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि यदि परंपरागत हुनर को आधुनिक साधनों और सरकारी सहयोग से जोड़ा जाए तो आत्मनिर्भरता का रास्ता खुलता है। पीएमएफएमई योजना ने बिहार के इस परिवार को न सिर्फ आर्थिक मजबूती दी, बल्कि महिला सशक्तिकरण की एक नई मिसाल भी गढ़ी।
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